इंतज़ार
वक़्त था गहरे दोस्त थे आज अनजान बन गए हैं, कभी सब कुछ था या थे निठलले, आज कुछ नहीं या साहब बन गए हैं, वक़्त ने इंतज़ार किया ऐसा कभी किसी का सब कुछ थे, आज इंतज़ार बन गए हैं। कभी रुकना था, नहीं रुके, कभी था दौड़ना, नहीं चले, ये इंतज़ार समझ ना आया तो बेज़ार बन गए हैं। किसी की कहानी से जुड़ कर, मालूम नहीं किस कहानी का कोनसा सार बन गए हैं, किसी को समझ आए तो बताना, वो ज़िन्दगी के साथ क्या कर रहे हैं। - गैफी